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किडनी कैंसर को कैसे समझे?


किडनी हमरे शरीर का सबसे खास अंग है, यह हमरे शरीर से कई अपशिष्ट उत्पादों को पेशाब के जरिये बाहर निकालने का काम करती है। किडनी अपना यह खास काम खून साफ करने के दौरान करती है। लेकिन जब किडनी किसी समस्या से घिर जाती है तो वह अपने काम को करने में असमर्थ हो जाती है, जिसके कारण व्यक्ति को बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
वैसे तो किडनी से जुडी बहुत सी समस्याएँ हैं, जैसे – किडनी स्टोन, फेल्योर, यूरिन, इन्फेक्शन आदि। हालांकि, इसमें सबसे गंभीर समस्या किडनी फेल्योर को माना जाता है, लेकिन इसके अलवा किडनी कैंसर भी किडनी से जुडी सबसे गंभीर और जानलेवा बीमारी है। किडनी कैंसर हो जाने पर इससे निपटाना काफी मुश्किल होता है।
अन्य कैंसर के मुकाबले किडनी कैंसर को काफी गंभीर माना जाता है, क्योंकि इसके हो जाने पर किडनी का सबसे जरुरी काम “रक्त शोधन” रुक जाता है। खून साफ ना होने के कारण रोगी को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे – शरीर के कई हिस्सों में सूजन, पेशाब से जुड़ी समस्या, कमजोरी, उल्टियाँ आना, भूख की कमी आदि।
किडनी में कैंसर किस प्रकार होता है?
किडनी का कैंसर, एक ऐसा कैंसर है जोकि किडनी की कोशिकाओं में शुरू होता है। किडनी का कैंसर एक असामान्य स्थिति होती है, इसमें कोशिकाओं का अनियंत्रित विकास होना शुरू हो जाता है, जो कि किडनी की सामान्य कोशिकाओं को नष्ट करने लग जाता है। किडनी की सामान्य कोशिकाओं के नष्ट होने के कारण शरीर के दूसरे अंग भी इससे प्रभावित होने लग जाते हैं। आम तौर पर किडनी में दो प्रकार के कैंसर पाए जाते हैं, लेकिन किडनी से जुड़े हुए चार प्रकार के कैंसर होते हैं जोकि निम्नलिखित है :-
1.      रीनल सेल का र्सिनोमा (RENAL CELL CARCINOMA)
रीनल सेल कार्सिनोमा (आरसीसी) किडनी में होने वाला एक ट्यूमर है जो किडनी कैंसर का रूप ले लेता है। किडनी में होने वाले कैंसर के लिए यह 90% तक कारण बनता है। यह किडनी के अंदर की छोटी नलिकाओं की लाइनिंग से उत्पन्न होता है। किडनी की यह छोटी नलिकाएं रक्त को साफ करने का काम करती हैं और मूत्र बनाती हैं। आमतौर पर तो यह ट्यूमर केवल एक ही किडनी में होता है लेकिन कभी-कभी यह दोनों किडनियों में भी हो सकता है। इसके अलावा ट्यूमर की संख्या एक से अधिक हो सकती है।
2.      ट्रान्सिशनल सेल कार्सिनोमा (TRANSITIONAL CELL CARCINOMA)
यूरोथेलियल कार्सिनोमा (Urothelial carcinoma) किडनी का यह कैंसर पेशाब से जुड़ी समस्या के कारण होता है। किडनी से जुड़े इस कैंसर के होने के पीछे ट्रान्सिशनल सेल कार्सिनोमा को कारण मन जाता है, यह पांच से दस फीसदी किडनी के कैंसर का कारण माना जाता है। किडनी का यह कैंसर किडनी से शुरू ना होकर किडनी के पेल्विस से शुरू होता है। पेल्विस किडनी को वो जगह है जहाँ पर पेशाब मुत्रवाही में जाने से पहले ठहरता है।
3.      विल्म्स ट्यूमर (WILMS TUMOR)
विल्म्स ट्यूमर किडनी में होने वाला एक गंभीर कैंसर है, क्योंकि यह बड़ों की तुलना में बच्चों में ज्यादा होता है। किडनी के इस कैंसर को नेफ्रोब्लास्टोमास के नाम से भी जाना जाता है।
4.      रीनल सारकोमा (RENAL SARCOMA)
किडनी में होने वाला कैंसर रीनल सारकोमा, किडनी का सबसे दुर्लभ कैंसर होता है। यह बाकि किडनी के कैंसर के मामलों में से सिर्फ एक प्रतिशत मामलों का कारण बनता है। रीनल सारकोमा का इलाज अन्य सारकोमा के समान किया जाता है।
क्या किडनी फेल्योर कि भांति किडनी कैंसर भी चरणों में होता है?
हाँ, किडनी फेल्योर के भांति ही किडनी कैंसर भी कई चरणों में होता है। किडनी फेल्योर को पांच चरणों में विभाजित किया गया है, लेकिन किडनी कैंसर को चार चरणों में विभाजित किया गया है। किडनी कैंसर के निम्न वर्णित चार चरण है :-
पहला चरण : पहले चरण का मतलब है कि ट्यूमर 7 से.मी. (इंच) से कम माप का है और किडनी तक ही सीमित है। इस चरण में रोगी को आराम से इससे छुटकारा दिलाया जा सकता है।
दूसरा चरण : दूसरे चरण का अर्थ है कि ट्यूमर का माप 7 से.मी. से अधिक है। दुसरे चरण में ट्यूमर का आकार टेनिस बोल के समान होता है। इस चरण में भी ट्यूमर किडनी तक ही सीमित रहता है।
तीसरा चरण : किडनी कैंसर में तीसरा चरण काफी जटिल होता है, क्योंकि इस चरण में ट्यूमर का आकार का अनुमान लगाना काफी जटिल होता है। तीसरे चरण में ट्यूमर किसी भी आकार का हो सकता है, साथ ही यह किडनी से लेकर आसपास के ऊतकों तक फैल जाता है और यह क्षेत्रीय लिम्फ नोड्स में भी फैल सकता है। ट्यूमर प्रमुख नसों या अधिवृक्क ग्रंथि में मौजूद होता है और किडनी व अधिवृक्क ग्रंथि के आस-पास वाले रेशेदार ऊतक के भीतर होता है।
चौथा चरण : किडनी कैंसर का चौथा चरण अंतिम चरण होता है। इस चरण में ट्यूमर अपने विकराल रूप में होता है। वह किडनी और अधिवृक्क ग्रंथि के आस-पास वाले रेशेदार ऊतक के बाहर फैल चूका होता है या यह कई लसीका नोड्स या शरीर के दूर के हिस्सों जैसे हड्डियों, मस्तिष्क, लीवर या फेफड़ों में फैल जाता है। अंतिम चरण किडनी एक दम खराब हो जाती है जिसे ठीक करना असंभव होता है।
कर्मा आयुर्वेदा द्वारा किडनी फेल्योर का आयुर्वेदिक उपचार :-
कर्मा आयुर्वेद पूर्णतः प्राचीन भारतीय आयुर्वेद के सहारे से किडनी फेल्योर का इलाज कर रहा है। कर्मा आयुर्वेदा साल 1937 से किडनी रोगियों का इलाज करते आ रहे हैं। वर्ष 1937 में धवन परिवार द्वारा कर्मा आयुर्वेद की स्थापना की गयी थी। वर्तमान समय में डॉ. पुनीत धवन कर्मा आयुर्वेदा को संभाल रहे है। डॉ. पुनीत धवन ने  केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर में किडनी की बीमारी से ग्रस्त मरीजों का इलाज आयुर्वेद द्वारा किया है। डॉ. पुनीत धवन ने 35 हजार से भी ज्यादा किडनी मरीजों को रोग से मुक्त किया हैं, वो भी डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट के बिना।



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