किडनी की विफलता एक गंभीर
समस्या है। जब कोई व्यक्ति किडनी की विफलता के अंतिम चरण में पहुंचता है, तब उसकी किडनीयां शरीर के तकरीबन सभी प्रमुख कार्यों को करना बंद कर देती है।
किडनी की विफलता की यह स्थिति व्यक्ति को यह संकेत देती है कि अब उसे किसी सटीक
उपचार की जरूरत है। इस जानलेवा बीमारी के अंतिम चरण में रोगी आमतौर पर एलोपैथी
उपचार लेना शूरू करते हैं, जिससे उनको कोई खास लाभ नहीं होता। एलोपैथी उपचार में
किडनी को पुनः ठीक करने के दो उपचार मौजूद है, डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट।
डायलिसिस द्वारा किडनी फेल्योर का उपचार :-
किडनी फेल्योर के अंतिम चरण में रोगी को
डायलिसिस जैसे जटिल उपचार से गुजरना पड़ता है, जोकि बहुत पीड़ादायक होता है।
डायलिसिस रक्त छानने की एक कृत्रिम क्रिया है, जो शरीर से अपशिष्ट उत्पादों और
अन्य विषाक्त तत्वों शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। किडनी खराब होने पर
शरीर में पानी की मात्रा बढ़ जाती है और रक्त मात्रा कम हो जाती है जिसे डायलिसिस
द्वारा ठीक करने की कोशिश की जाती है। डायलिसिस किडनी फेल्योर का सफल उपचार नहीं
है, बल्कि यह सिर्फ रोगी को राहत भर देने का एक कृत्रिम उपचार है। हर रोगी इस
उपचार को सहन नहीं पाता क्योंकि इसके दौरान रोगी को पीड़ा का सामना करना पड़ता है।
अक्सर देखा गया है कि जिन लोगो की किडनी मधुमेह के कारण खराब होती है उनको
डायलिसिस से ज्यादा गुजरना पड़ता है। मुख्य रूप से डायलिसिस दो प्रकार का होता है,
पहला : हीमोडायलिसिस और दूसरा : पेरिटोनियल डायलिसिस
क्या डायलिसिस किडनी फेल्योर का उचित उपचार है?
नहीं, डायलिसिस किडनी फेल्योर का समाधान नहीं है, यह
एक कृत्रिम उपचार है जो मशीन की मदद से रक्त को शुद्ध करता है जब किसी व्यक्ति की
किडनी ऐसा करने में सक्षम नहीं होती है। डायलिसिस सिर्फ एक अस्थायी उपचार है जो
किडनी को कुछ कार्य के लायक बनाता है। इस प्रक्रिया को एक सुधार भी कहा जा सकता है,
जो केवल कुछ समय के लिए गुर्दे की विफलता के
लक्षणों के लिए एक ठहराव के रूप में काम करता है। यदि आप लम्बे समय से डायलिसिस से
गुजर रहे हैं तो आपको आयुर्वेद की मदद लेनी चाहिए। आयुर्वेद की मदद से डायलिसिस
जैसे जटिल किडनी उपचार से बचा जा सकता है।
किडनी ट्रांसप्लांट द्वारा किडनी फेल्योर का उपचार :-
किडनी ट्रांसप्लांट आम
तौर पर उन रोगियों का किया जाता है जो किडनी फेल्योर की जानलेवा बीमारी के के
अंतिम चरण में होते हैं। किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान रोगी को कई दवाओं का सेवन
करवाया जाता है, जिससे रोगी का शरीर नई किडनी अपना सकें। इन दवाओं में रोगी को
प्रतिरक्षादमनकारी (immunosuppressant) नामक एक खास दवा दी जाती है। इस दवा से रोगी
को कई दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है। किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान रोगी
को संक्रमण, मूत्र संक्रमण, दस्त, अत्यधिक बाल विकास या बाल गिरना, रक्तस्राव, सूजन, पेट की ऐंठन, मुँहासा, मूड स्विंग, एनीमिया, गठिया, दौरे, मधुमेह की संवेदनशीलता, कैंसर का खतरा और वजन बढ़ने का खतरा रहता है।
किडनी ट्रांसप्लांट के
बाद रोगी को बहुत ही महँगी दवाओं का सेवन सदा के लिए-आजीवन लेनी पडती है। शुरू में
दवाइँ की मात्रा (और खर्च भी) ज्यादा लगती है, जो समय के साथ धीरे-धीरे
कम होती जाती है। किडनी प्रत्यारोपण करने के बाद मरीजों द्वारा ली जानेवाली
दवाईयों में उच्च रक्तचाप की दवा,
कैल्शियम, विटामिन्स इत्यादि दवाईयाँ कम या बढ़ाया जा सकता हैं। किडनी ट्रांसप्लांट के
बाद संक्रमण होने का खतरा रहता है, जिसके कारण शरीर के श्वेतकणों में रोगप्रतिरोधी
पदार्थ (एन्टिबॉडीस) बनते है। यह एन्टिबॉडीस जीवाणु से संघर्ष करके उसे नष्ट कर
देते हैं। इसी प्रकार नई लगाई गई किडनी बाहर की होने के कारण मरीज के श्वेतकणों
में बने एन्टिबॉडीस किडनी को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इस प्रकार नुकसान के कारण नई
किडनी खराब हो जाती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में किडनी रिजेक्शन कहा जाता है।
किडनी की अस्वीकृति, ट्रांसप्लांट के बाद किसी भी समय हो सकती है। प्रायः यह पहले छः माह में होती
है। अस्वीकृति की गंभीरता हर रोगी में अलग होती है। प्रायः किडनी की अस्वीकृति
होना किसी विशेष कारण से नहीं होता है और इसका इलाज उचित इम्युनोसप्रेसेन्ट
चिकित्सा द्वारा हो जाता है। पर कुछ रोगियों में किडनी की अस्वीकृति होना गंभीर हो
सकता है और जो अंत में किडनी को नष्ट कर सकता है।
कर्मा आयुर्वेदा द्वारा किडनी फेल्योर का आयुर्वेदिक उपचार
:-
आयुर्वेदिक उपचार ही ऐसा
उपचार है जिसकी मदद से हम किसी भी प्रकार के रोग को जड़ से खत्म कर सकते हैं।
आयुर्वदिक पद्धत्ति द्वारा उपचार कराते हुए हम इस बात से निश्चित होते हैं कि यह
दवाएं अंग्रेजी दवाओं की तरह हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचने वाली। क्योंकि
अयुर्वेदिक दवाओं में कोई केमिकल नहीं होता। आयुर्वेद में सभी उपचार प्राकृतिक
जड़ी-बूटियों से किया जाता है। आयुर्वेद के सहायता से किडनी फेल्योर का सफल उपचार
किया जा सकता है।
इस समय देशभर में अनेक
आयुर्वेदिक उपचार केंद्र उपलब्ध है, कर्मा आयुर्वेद एक ऐसा किडनी उपचार केंद्र है जो पूरी तरह से आयुर्वेदिक दवाओं
से किडनी फेल्योर का उपचार करता है। कर्मा आयुर्वेद की स्थापना वर्ष 1937 में हुई थी, तभी से कर्मा आयुर्वेदा किडनी रोगियों का इलाज
करते आ रहा हैं। वर्तमान समय में डॉ. पुनीत धवन इसका नेतृत्व कर रहे हैं। आपको बता
दें कि आयुर्वेद में डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट के बिना किडनी की इलाज किया
जाता है।
आयुर्वेद में प्राकृतिक
जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता हैं। जिससे हमारे शरीर में कोई साइड इफेक्ट
नहीं होता हैं। डॉ. पुनीत धवन ने केवल
भारत में ही नहीं बल्कि विश्वभर में किडनी की बीमारी से ग्रस्त मरीजों का इलाज
आयुर्वेद द्वारा किया है। साथ ही डॉ. पुनीत धवन ने 35 हजार से भी ज्यादा किडनी मरीजों को रोग से मुक्त किया हैं।
वो भी डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट के बिना। कर्मा आयुर्वेदा किडनी ठीक करने को
लेकर चमत्कार के रूप में साबित हुआ हैं।